Thursday, June 19, 2008

हमारे देश में ब्रेकिंग न्यूज़ (Breaking News in India)

विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के इस महत्वपूर्ण स्तंभ
अर्थात " भारतीय मीडिया" के बारे में आपका क्या ख्याल है ??
(कृपया चित्र देखें )
What is your opinion about
Indian Media-The important Piller of world's largest Democracy ???
(Please see the pictures)




विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के इस महत्वपूर्ण स्तंभ
अर्थात " भारतीय मीडिया" के बारे में आपका क्या ख्याल है ??
What is your opinion about
Indian Media-The important Piller of world's largest Democracy ???

Tuesday, May 27, 2008

आरुशी हत्याकांड और पोलीस की जल्दबाजी


नोएडा के सनसनी खेज आरूशी - खेमराज हत्याकांड की जांच कर रही उतत्र प्रदेश पोलीस द्वारा जल्दबाजी में और बीना कीसी सबूत के आरूशी-खेमराज और राजेश तलवार-डॉ अनिता के बीच सम्बन्ध होने की बात करना अनैतिक है।

यदी यह बात ग़लत साबीत हुई तो उनकी मानहानी के लिए कौन जीम्मेदार होगा?
क्या सरकार इसकी भरपाई कर सकेगी?

Sunday, May 4, 2008

राज ठाकरे का आन्दोलन

आज कल "राज ठाकरे" और मुम्बई में "बाहरी लोग" चर्चा का आम विषय है।

राज के विचारों के बारे में लोगों की अलग अलग राय है। ये अलग बात है कि कई लोग राजनीतिक कारणों से राज के समर्थन में नहीं बोल पा रहे है। पर मुम्बई ही नहीं वरन देश के सभी महानगरों पर हर रोज़ लाखों नए लोगों के भार से कई तरह की समस्याएँ उत्पन्न हो रही है।


अगर हम कुछ समय पहले दिल्ली की मुख्यमंत्री श्रीमती शीला दीक्षित का बयान याद करें, तो उन्होंने भी दिल्ली की व्यवस्था पर बाहरी लोगों के बढ़ते भार पर चिंता व्यक्त की थी। ये अलग बात है कि राजनीतिक दबाव के चलते उन्हें अपना बयान वापस लेना पडा था, पर इससे समस्या की गंभीरता स्पष्ट होती है।

राज ठाकरे के आन्दोलन को राजनीती से प्रेरित माना जा रहा है। जो धीरे धीरे प्रान्तवाद में परिवर्तित होता जा रहा है। मेरे विचार से इस प्रश्न को राजनीतिक प्रश्न न मानते हुए इसके मूल कारण का विचार करना चाहिए। और मूल प्रश्न है "रोजगार" ।

उत्तर प्रदेश हो या बिहार या कोई भी अन्य प्रांत, किसी भी व्यक्ति के महानगर की और रुख करने का एकमात्र कारण केवल रोजगार है। छोटे शहरों या गावों में जब तक रोजगार उपलब्ध नही होगा तब तक लोगों का शहरों की और पलायन जारी रहेगा।

लेकिन सरकार, मीडिया और राजनीतिक दल बजाय मूल प्रश्न को सुलझाने के अपने अपने तरीकों से स्वार्थ सिद्ध करने में लगे है। गावों में रोजगार के अवसर उत्पन्न करने में पिछली सभी सरकारें असफल रही है, ऐसे में जरुरत है नए तरीके से सोचने की।

उत्तर प्रदेश के एक युवा सामाजिक कार्यकर्त्ता श्री भारत गांधी के विचारों को इस समय गंभीरता से लिया जाना चाहिए। श्री गांधी ने गहन अध्ययन करके votership की संकल्पना की है । जिसके अनुसार देश के प्रत्येक मतदाता को उनके मतदान के एवज में 1750 रुपये दिए जाना चाहिए जिससे समाज के निचले स्तर तक पैसा पहुंचेगा और लोगों की खरीदने की क्षमता बढेगी। इस वोटर शिप को देने के लिए आवश्यक धन के लिए श्री गांधी की सलाह है कि सरकार वे सभी जनहित कार्यक्रम बंद कर दे जिसके द्वारा पैसा लोगों को बांटा जा रहा है। इससे ना केवल भ्रष्टाचार में कमी होगी वरन मतदान का प्रतिशत बढेगा, सीधे पैसा मिलाने से जनता का जीवन स्तर सुधरेगा, शहरों की और पलायन रुकेगा और भीक मँगाने, चोरी आदी अपराधों में भी कमी आयेगी । साथ ही मतदान आवश्यक होने से चुनाव में खर्च कम होगा। इस प्रस्ताव का अनुमोदन सभी राजनीतिक दलों के १०० से अधिक सांसदों ने कर लोकसभा के सभापती को प्रेषित किया है।

श्री भरत गांधी के प्रस्ताव को http://www.votership.com/ पर देखा जा सकता ।

Thursday, April 24, 2008

दूसरा पहलू

सुबह ६.१५ की मुम्बई से दिल्ली की पहली फ्लाईट। मैं विमान में अपनी आयल सीट पर बैठ गया। इंतज़ार करते हुए की विंडो सीट का सहयात्री आए और मैं एक अबाधित झपकी लूँ ।

करीब १० मिनिट में आधे से अधिक सीटें भर चुकी थी। मैं आँखें बंद कर नींद को सहेजने की कोशिश कर रहा था। एक लड़की की "एक्सक्यूज मी " आवाज सुनकर मैंने आँखें खोली और उसे रास्ता देने के लिए खडा हुआ।

चेहरा जाना पहचाना लग रहा था। सोचने लगा... कौन है ये लड़की? कहाँ देखा है इसे? इसी बीच वो पास की विंडो सीट पर बैठ चुकी थी। मैंने भी बैठकर आँखें मूँद ली और याद करने लगा की इस लड़की को कहाँ देखा है?

अरे!!! ये तो शायद मोनिका बेदी है!!! मैंने आँखें खोलकर कन्फर्म करने के लिए उसकी और देखा... हाँ, मोनिका बेदी ही है ।

नींद उड़ चुकी थी, टीवी पर देखी हुई मोनिका बेदी की भिन्न भिन्न न्यूज़ आंखों के सामने घूम रही थी। अबू सलेम, अंडरवर्ल्ड , पूर्तगाल में अबू सलेम के साथ गिरफ्तारी, भारत प्रत्यार्पण, कोर्ट में पेशी के लिए जाती मोनिकाआदी समाचार लाइव टेलीकास्ट की भांती आंखों के सामने दिख रहे थे।

इसी बीच विमान उड़ान भर चुका था। करीब आधे घंटे बाद बेल्ट लगाने का साइन ऑफ़ हुआ और यात्रीयों को नाश्ता देने के लिए केबिन क्रू की हलचल शुरू हुई।

चहरे पर शांती और थकान के मिश्रित भाव, सामने से किसी के आने पर खिड़की से बाहर देखना आदि से लगा रहा था की मोनिका स्वयं को दूसरों की नज़रों से बचाना चाह रही है ।

एस्क्यूज मी ... आर यूं मोनिका ? मैंने पूछा

उत्तर में उसने मुस्कुराकर "हाँ" में गर्दन हिलाई।

मैंने अपना परिचय दिया। उसे अपना परिचय देने की जरुरत नहीं थी, पर उसने पर्याप्त रिस्पोंस देकर संवाद में रुची प्रदर्शित की।

एक आम हिंदुस्थानी की हैसीयत से मैंने मोनिका के बारे में समाचार माध्यमों में काफी पढा था पर यहाँ उसका जिक्र करना मूर्खता होती। और जब कोर्ट ने उसे बरी कर दिया हो तो किसी और को सफाई मांगने का अधिकार नहीं बचता है। सो मैंने उस ना विषय को ना छूना ही ठीक समझा ।

शुरुआती बातचीत में मोनिका ने बताया की आजकल वो फ़िल्म इंडस्ट्री में कम बेक की तैयारी कर रही है, और जल्द ही एक प्रोजेक्ट शुरू होने की उम्मीद है।


मेरे पूछने पर उसने बताया की कोर्ट से बरी होने के बाद वो जीवन में बहुत शांती महसूस कर रही है। जो हुआ बहुत बुरा हुआ और उसे में एक बुरे सपने की तरह भूल कर फ़िर से एक सामान्य जीवन जीना चाहती हूँ। कठिनाइयां अभी भी आ रही है, मीडिया पीछे पडा रहता है, पर मेरी कोशिशें जारी है।


आगे मोनिका कहती है की मेरे बुरे समय में मेरे परिवार और दोस्तों ने मुझे बहुत सपोर्ट किया और मेरा हौसला बढाते रहे, यही कारण है की मैं फ़िर से अपना करियर शुरू करने की हिम्मत कर रही हूँ।


बातों का सिलसिला करीब एक घंटे बाद ख़त्म हुआ, जब सीट बेल्ट लगाने का निर्देश हुआ । मुझे दिल्ली उतरना था, जबकि मोनिका इसी फ्लाईट से चण्डीगढ़ जा रही थी।


आजकल किसी भी पब्लिक फिगर की हर छोटी-बड़ी, महत्वपूर्ण या फालतू, सच या झूठ किसी भी ख़बर की जुगाली हर न्यूज़ चेनल कई दिनों तक करता रहता है, फ़िर भी कई पहलू सामने आने से रह जाते है।


मोनिका बेदी दोषी थी या नहीं, उसके अंडरवर्ल्ड से संबंध थे या नहीं ये टू मैं नहीं कह सकता, पर उसका फ़िल्म इंडस्ट्री में लौटने का हौसला देखकर सोचने लगा की एक २७ - २८ साल की लड़की, जिस पर अंडरवर्ल्ड से रिश्तों के आरोप लगे हों, गिरफ्तार होकर महीनों तक जेल में रही हो, हर अखबार- टीवी चेनल जिसके बारे में नेगेटिव ही लिखता हो, उसने कितना मानसिक त्रास सहा होगा? कई अपनों ने दूरियां बना ली होगी, किसी के मन में डर या किसी के मन में नफ़रत होगी।


ऐसी परिस्थिती से लड़ना किसी लड़की के लिए आसान काम नहीं हो सकता । आजकल छोटी छोटी परेशानियों से घबराकर या dipressed होकर drugs लेना या आत्महत्या करने की खबरें काफी सुनने को मिलाती है, ऐसे में मोनिका बेदी जैसी लड़की का फ़िर से काम पर लौटकर सामान्य जीवन जीने की हिम्मत करना निश्चित ही सराहनीय है।


मेरी शुभकामनाएं।